Saturday, 16 May 2015

tanu thadani तनु थदानी मेरी हँसी में


मेरी मुस्कान की सरहदें
खुली हैं चारों दिशाओं से ;
मैं जब हँसु ; आ के घुल जाना मेरी हँसी में !




मैं दरवाजा खटखटाऊंगा ,
तुम दौड़ कर आओगी ,
खोलोगी दरवाजा ; मुझसे लिपट जाओगी ,
बिना ये देखे
बिना ये परवाह किये
कि कोई साथ भी है मेरे !
मैं बंध जाऊंगा तेरी बांहों से ,
पुरानी यादों में जा के ,मुस्कुराना मेरी हँसी में !




दिल में दिमाग की घुसपैठ ,
मार डालती है प्यार के ख्वाबों को !
देर तलक छानना अपने ख्वाब,
हकीकत के टुकड़े छनेंगे जरूर ,
जिन्दा ख्वाबों का अंतिम पड़ाव ,
मिलता है प्यार की राहों से,
आना खुद को भी भूल जाना मेरी हँसी में !




सपाट सी जिंदगी को खोदना ,
होठों पे मुस्कान गोदना  ;
तब नहीं बोलते हम
जब बातें करती हमारी सांस है,
ये ही हमारे तुम्हारे होने का सारांश है ;
जो जाहिर हो जाते हैं निगाहों से ;
बेशक रूठना,बेशक छिपना ,मगर लौट आना मेरी हँसी में !
मैं जब जब हँसु ;आ के घुल जाना मेरी हँसी में !!

Tuesday, 5 May 2015

Tanu Thadani तनु थदानी महज हवा ही तो हूँ मैं


शीर्षक का एक अनुबंध होता है
कथानक के साथ ;
शीर्षक चुपके से बता जाता है -
कथानक का सारांश !


मैं तुम्हें हमारी प्रेम कथा का शीर्षक बनाता हूँ
खुद सरल सारांश के लिये
एक कथानक बन जाता हूँ !


मेरे कथानक के आंगन में
बाबू जी हैं ;अम्मा है ;और बच्चे हैं !
मेरे कथानक की छत पे
कड़ी धूप में सूखते
हमारे प्रेम के किस्से हैं ;
वो हमारे परिवार के ही हिस्से हैं
बेशक उबर -खाबड़ हैं
फिर भी अच्छे हैं !


तुम रसोई घर में खाना बनाती हो ;
कपड़े धोती हो ; घर सजाती हो ;
परदे लगाती हो फिर मेरे पास आती हो !
मैं घटनाओं सा पसर जाता हूँ
महज हवा ही तो हूँ मैं
मगर तुम तो हो मेरी सांस !


जितना आसान है होता बनना कथानक
उतना कठिन होता है चुनना एक शीर्षक !
बेहद सुखद होता है
किसी शीर्षक का स्वत: चुपके से
बनना कथानक का सारांश  !


हाशिये तक खाली नहीं रहें कथानक के पन्नों के ;
बाबू जी और अम्मा ने लिख दिया था वहाँ
कि कथानक और शीर्षक दोनों ही अच्छे हैं !