Friday, 24 April 2015

tanu thadani तनु थदानी हम और तुम

फिर मिलेंगे
कहते हैं विदा होने से पहले
कितने आशावान हैं हम और तुम !


बेवकूफियों के अस्तर लगी जिंदगी जीते हैं ;
कल का नहीं पता
मगर अगले कई सालों की रूपरेखा में हैं उलझे ;
हरे से लाल हैं होते
कि जैसे पान हैं हम और तुम !


हमारे जिस्म के भूगोल का
इतिहास बनने का गणित
पूरा दर्शन शास्त्र है !
घड़ियां तो आईना होती हैं
टिक टिक कह कह
नहीं टिकती हैं खुद
न देती हैं टिकने ;
बताती हैं -
इसी परिपथ में घूमना ही जीवन मात्र है  !
तुम मुझमें
मैं उतरता हूँ तुझमें
खोजते हैं जीने को प्यार के पल ;
कैसे मान लू्ं कि मात्र सांसों की खान हैं हम और तुम !!

Wednesday, 1 April 2015

tanu thadani तनु थदानी हां मैं हूँ बहुत तन्हा

हां ! मैं हूँ बहुत तन्हा;
मेरा बिस्तर तन्हा;
उसकी हर इक सिलवट तन्हा ;
मैं -बिस्तर -सिलवट सब हैं साथ घुले मिले ;
क्यूँ मेरी तन्हाई नहीं घुल पाती है ?




मेरे घर की चारों दीवारें हैं साथ
पूरी छत को सम्भाले ;
मगर चारों खड़ी हैं तन्हा !
बरसों से बन्द पड़ी खिड़कियाँ ;
खिड़कियों पर जंग खायी छिटकनियां ;
क्यूँ चुप पड़ी हैं तन्हा ?
क्यूँ नहीं खुल पाती हैं ?




हमारी रिश्तेदारी
केवल अपनी अपनी तन्हाईयों से है !
हमारी शिकायत
एक दूसरे के बीच की खाईयों से है !
शाम को चाँद आता है तन्हा ;
सुबह से पहले जाता है तन्हा !
पूरी तन्हाई टूट कर बिखर है जाती
जब सुबह सुबह बुलबुल गाती है !


मैं कभी खुश नहीं रहा अपनी तन्हाईयों से ;
बिस्तर -सिलवट -खिड़की -छिटकनी-खाईयों से !





मैं एक भी आंसू नहीं गवांऊगा ;
मेरी तन्हाईयों के तमाशबीन
केवल तुम रोओगे ;
जिस दिन मैं तुम्हें तन्हा कर जाऊँगा !
पूरी कायनात से टपकती रिसती
सख्त सूखी तन्हाईयां ;
चिपक गई हैं मैल की मानिंद ;
क्यूँ नहीं धुल पाती हैं ?
जबकि मुझे भी रोज सुबह सुबह ;
गाती हुई बुलबुल भाती है !!
----------------- तनु थदानी